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लंड शिश्न अर्थात Penis की संरचना और कार्य मूत करने से लेकर चुदाई तक

लंड शिश्न अर्थात Penis की संरचना और कार्य मूत करने से लेकर चुदाई तक : शिश्न (Penis) कशेरुकी और अकशेरुकी दोनो प्रकार के कुछ नर जीवों का एक बाह्य यौन अंग है

तकनीकी रूप से शिश्न मुख्यत: स्तनधारी जीवों में प्रजनन हेतु एक प्रवेशी अंग है, साथ ही यह मूत्र निष्कासन हेतु एक बाहरी अंग के रूप में भी कार्य करता है। शिश्न आमतौर स्तनधारी जीवों और सरीसृपों मे पाया जाता है।

हिन्दी मे शिश्न को लिंग भी कहते हैं पर, इन दोनो शब्दों के प्रयोग मे अंतर होता है, जहाँ शिश्न का प्रयोग वैज्ञानिक और चिकित्सीय संदर्भों में होता है वहीं लिंग का प्रयोग आध्यात्म और धार्मिक प्रयोगों से संबंद्ध है। दूसरे अर्थो मे लिंग शब्द, किसी व्यक्ति के पुरुष (नर) या स्त्री (मादा) होने का बोध भी कराता है। हिन्दी मे सभी संज्ञायें या तो पुल्लिंग या फिर स्त्रीलंग होती हैं।

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शिश्न की संरचना: 1 — मूत्राशय, 2 — जघन संधान, 3 — पुरस्थ ग्रन्थि, 4 — कोर्पस कैवर्नोसा, 5 — शिश्नमुंड, 6 — अग्रत्वचा, 7 — कुहर (मूत्रमार्ग), 8 — वृषणकोष, 9 — वृषण, 10 — अधिवृषण, 11— शुक्रवाहिनी

संरचना

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मानव शिश्न जैविक ऊतक के तीन स्तंभों से मिल कर बनता है। पृष्ठीय पक्ष पर दो कोर्पस कैवर्नोसा एक दूसरे के साथ-साथ तथा एक कोर्पस स्पोंजिओसम उदर पक्ष पर इन दोनो के बीच स्थित होता है। कोर्पस स्पोंजिओसम का वृहत और गोलाकार सिरा शिश्नमुंड मे परिणित होता है जो अग्रत्वचा द्वारा सुरक्षित रहता है। अग्रत्वचा एक ढीली त्वचा की संरचना है जिसको अगर पीछे खींचा जाये तो शिश्नमुंड दिखने लगता है। शिश्न के निचली ओर का वह क्षेत्र जहाँ से अग्रत्वचा जुड़ी रहती है अग्रत्वचा का बंध (फेरुनुलम) कहलाता है।

शिश्नमुंड के सिरे पर मूत्रमार्ग का अंतिम हिस्सा जिसे कुहर के रूप में जाना जाता है, स्थित होता है। यह मूत्र त्याग और वीर्य स्खलन दोनों के लिए एकमात्र रास्ता होता है। शुक्राणु का उत्पादन दोनो वृषणों मे होता है और इनका संग्रहण संलग्न अधिवृषण (एपिडिडिमिस) में होता है। वीर्य स्खलन के दौरान, शुक्राणु दो नलिकाएं जिन्हें शुक्रवाहक (वास डिफेरेंस) के नाम से जाना जाता है और जो मूत्राशय के पीछे की स्थित होती हैं से होकर गुजरते है। इस यात्रा के दौरान सेमिनल वेसाइकल और शुक्रवाहक द्वारा स्रावित तरल शुक्राणुओं मे मिलता है और जो दो स्खलन नलिकाओं के माध्यम से पुर:स्थ ग्रंथि (प्रोस्टेट) के अंदर मूत्रमार्ग से जा मिलता है। प्रोस्टेट और बल्बोयूरेथ्रल ग्रंथियों, इसमे और अधिक स्रावों को जोड़ते है और वीर्य अंतत: शिश्न के माध्यम से बाहर निकल जाता है।

रैफ शिश्न कि नीचे की जहाँ शिश्न के पार्श्व आर्ध जुड़ते हैं पर स्थित एक दृश्य रिज होती है। यह कुहर (मूत्रमार्ग का द्वार) से शुरु होकर वृषणकोष (वृषण की थैली) को पार कर पेरिनियम (अंडकोश की थैली और गुदा के बीच का क्षेत्र) तक जाता है।

मानव शिश्न अन्य स्तनधारियों के शिश्न से भिन्न होता है, क्योंकि इसमे बैकुलम या स्तंभास्थि नहीं होती और यह स्तंभन के लिये पूरी तरह सिर्फ रक्त के भरने पर निर्भर होता है। इसे ऊसन्धि (ग्रोइन) में वापस सिकोड़ा नहीं जा सकता और काया-भार के आधार पर यह अनुपात में अन्य जानवरों से औसत में बड़ा होता है।

 

यौवनारम्भ

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विकास की अवस्थायें - लंड शिश्न अर्थात Penis की संरचना और कार्य मूत करने से लेकर चुदाई तक

यौवन मे प्रवेश पर, अंडकोष विकसित होते हैं और यौनांग बडे़ हो जाते हैं। शिश्न का विकास 10 वर्ष की उम्र से लेकर 15 वर्ष की उम्र के बीच शुरू हो सकता है। विकास आमतौर पर 18-21 साल की उम्र तक पूरा हो जाता है। इस प्रक्रिया के दौरान, शिश्न के ऊपर और चारों ओर जघन बाल आ जाते हैं।

लंड शिश्न अर्थात Penis की संरचना और कार्य मूत करने से लेकर चुदाई तक - स्तंभन

चित्र:Erection development animated.ogv
स्तंभन विकास. - लंड शिश्न अर्थात Penis की संरचना और कार्य मूत करने से लेकर चुदाई तक

स्तंभन से अभिप्राय शिश्न के आकार मे बढ़ने और कडा़ होने से है, जो यौनिच्छा करने पर शिश्न के उत्तेजित होने के कारण होता है, यद्यपि यह गैर यौन स्थितियों में भी हो सकता है। प्राथमिक शारीरिक तंत्र जिसके चलते स्तंभन होता है, मे शिश्न की धमनियाँ स्वतः फैल जाती हैं, जिसके कारण अधिक रक्त शिश्न के तीन स्पंजी ऊतक कक्षों मे भर जाता है और इसे लंबाई और कठोरता प्रदान करता है। यह रक्त से भरे ऊतक रक्त को वापस ले जाने वाली शिराओं पर दबाव डाल कर सिकोड़ देते है, जिसके कारण अधिक रक्त प्रवेश करता है और कम रक्त वापस लौटता है। थोडी़ देर बाद एक साम्यावस्था अस्तित्व मे आती है जिसमे फैली हुई धमनियों और सिकुडी़ हुई शिराओं मे रक्त की समान मात्रा बहने लगती है और इस साम्यावस्था के कारण शिश्न को एक निश्चित स्तंभन आकार मिलता है।

यद्यपि स्तंभन संभोग के लिये आवश्यक है पर विभिन्न अन्य यौन गतिविधियों के लिए यह आवश्यक नहीं है।

स्तंभन कोण - लंड शिश्न अर्थात Penis की संरचना और कार्य मूत करने से लेकर चुदाई तक

हालांकि कई स्तंभित (तने हुये) शिश्न की दिशा ऊपर की ओर होती है पर एक सामान्य शिश्न किसी भी दिशा मे स्तंभित (उपर, नीचे, दायं, या बायं) हो सकता है और यह इसके सस्पेन्सरी लिगामेंट (लटकानेवाला बंधन) जो शिश्न को इसकी स्थिति मे रखते है के तनाव पर निर्भर करता है। निम्नलिखित सारणी दिखाती है कि कैसे एक खड़े पुरुष के लिए विभिन्न स्तंभन कोण बिल्कुल सामान्य हैं। इस तालिका में, शून्य डिग्री से सीधे ऊपर की ओर है पेट के ठीक सामने, 90 डिग्री क्षैतिज है और सीधे आगे की ओर इंगित है, जबकि 180 डिग्री से सीधे नीचे पैरों की ओर इशारा किया जाएगा। एक ऊपर की ओर इंगित कोण सबसे आम है।

स्तंभन कोण घटना
कोण (डिग्री) प्रतिशत