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अपनी ही बहू और बेटी के लिए सास ससुर लाते है ग्राहक. एक रात में 3 से 4 ग्राहक को करती है संतुष्ट फिर आती हैं घर

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अपनी ही बहू और बेटी के लिए सास ससुर लाते है ग्राहक. एक रात में 3 से 4 ग्राहक को करती है संतुष्ट फिर आती हैं घर

अपनी ही बहू और बेटी के लिए सास ससुर लाते है ग्राहक. एक रात में 3 से 4 ग्राहक को करती है संतुष्ट फिर आती हैं घर : कितना अजीब लगता है ये सोचना भी कि माता-पिता खुद अपने घर की लड़कियों को बेटियों को बहुओ को इस सेक्स के धंधे में झोंक देते हैं. ये अजीब भले ही लगे लेकिन सच है की दिल्ली जैसे शहर में माता-पिता खुद ही अपनी बहू और बेटी के लिए  ग्राहक लेकर आते है और यह उनके सामने ही उनकी इज्जत को तार – तार करते है| कोई  लड़की इसका विरोध नहीं करती है क्योकि उन्हें बचपन से ही यह सब सिखाया जाता है|

आज जहां बेटियों को महज इसलिये जन्म नहीं लेने दिया जाता है कि उनकी शादी में लाखों की दहेज़ कहां से आयेगा। लेकिन इस समुदाय के लोगों को बेटियों की शादी की कोई चिंता नहीं होती, क्योंकि शादी करने पर लड़के वाला अच्छे दाम भी देता है. यानि लाख, दो लाख या पांच लाख जितने में भी सौदा पटे, लड़की शादी के नाम पर इसी समुदाय में बेच दी जाती है. शादी के बाद वो लड़की घर भी संभालती हैं, और सबका पालन पोषण भी करती हैं. यानी परिवार की रोजी रोटी चलाने की जिम्मेदारी भी उठती है, क्यूंकि यहां तो मर्द कुछ करते हैं तो बस आराम। घर आराम से चल सके इसके लिए अपनी ही बहु के लिए ग्राहक की तलाश उनके ससुराल वाले यानी सास-ससुर ही करते हैं. आखिर अब वही तो घर चलाएगी ।

एक रात में 3 से 4 ग्राहक को करती है संतुष्ट फिर आती हैं घर

घर के सारे काम-धाम निपटाने के बाद रात को करीब 2 बजे ये महिलाएं अपने काम से निकलती हैं. एक ही रात में करीब 4-5 ग्राहकों को संतुष्ट करने के बाद सुबह तक लौटती हैं. पति और बच्चों के लिए खाना बनाकर अपने हिस्से की नींद पूरी करती हैं. ऐसा यहां की हर महिला के साथ होता है. महिलाएं अगर कोई दूसरा काम करना भी चाहें तो ससुराल वाले उन्हें जबरदस्ती इसी पेशे में धकेलते हैं. कोई महिला नहीं चाहती कि उसकी बेटियां बड़ी होकर इस पेशे को अपनाएं. लेकिन महिला अधिकार के नाम पर ये सिर्फ इतना जानती हैं कि उनके जीवन पर उनके परिवारवालों का ही अधिकार है और उनके साथ क्या होना है या नहीं होना है, इसका फैसला भी वही लोग करेंगे जो उन्हें खरीद कर लाए हैं ।

सभ्यता और संस्कृति के विकास के साथ वेश्यावृत्ति (Prostitution) का भी पूरी दुनिया में चरम उभार हो चुका है। पोस्ट मॉडर्न सोसाइटी में वेश्यावृत्ति के अलग-अलग रूप भी सामने आए हैं। रेड लाइट इलाकों से निकल कर वेश्यावृत्ति (Prostitution) अब मसाज पार्लरों एवं एस्कार्ट सर्विस के रूप में भी फल-फूल रही है। देह का धंधा कमाई का चोखा जरिया बन चुका है। गरीब और विकासशील देशों जैसे भारत, थाइलैंड, श्रीलंका, बांग्लादेश आदि में सेक्स पर्यटन का चलन शुरू हो चुका है। जिस्मफरोशी दुनिया के पुराने धंधों में से एक है। बेबीलोन के मंदिरों से लेकर भारत के मंदिरों में देवदासी प्रथा वेश्यावृत्ति (Prostitution) का आदिम रूप है। गुलाम व्यवस्था में गुलामों के मालिक वेश्याएं रखते थे। उन्होंने वेश्यालय भी खोले। तब वेश्याएं संपदा और शक्ति की प्रतीक मानी जाती थीं।

मुगलों के हरम में सैकड़ों औरतें वेश्यावृत्ति (Prostitution) के लिये रहती थीं। जब अंग्रेजों ने भारत पर अधिकार किया तो इस धंधे का स्वरूप बदलने लगा। राजाओं ने अंग्रेजों को खुश करने के लिए तवायफों को तोहफे के रूप में पेश करना शुरू किया। पुराने वक्त के कोठों से निकल कर देह व्यापार का धंधा अब वेबसाइटों तक पहुंच गया है। इन्फॉरमेशन टेक्नोलॉजी के मामले में पिछड़ी पुलिस के लिए इस नेटवर्क को भेदना खासा कठिन है। सिर्फ नेट पर अपनी जरूरत लिखकर सर्च करने से ऐसी दर्जनों साइट्स के लिंक मिल जाएंगे जहां हाईप्रोफाइल वेश्याओं के फोटो, फोन नंबर और रेट तक लिखे होते हैं। इन पर कालेज छात्राएं, मॉडल्स और टीवी-फिल्मों की नायिकाएं तक उपलब्ध कराने के दावे किए जाते हैं।

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अपनी ही बहू और बेटी के लिए सास ससुर लाते है ग्राहक. एक रात में 3 से 4 ग्राहक को करती है संतुष्ट फिर आती हैं घर