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बलात्कार - Sex Stories - Indian rape stories

बलात्कार - Sex Stories - Indian rape stories : दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा एक और नई कहानी लेकर हाजिर हूँ कहानी आप सब को अच्छी लगेगी .
कैसे दिन हफ्तों में और हफ्ते महीनो में बदल गये, मानो पता ही नहीं चला. अचानक ही एक दिन रूपाली को एहसास हुआ कि हवेली के चारों तरफ झाड़-घास-फूस बढ़ गये हैं. रूपाली को खुद पर गुस्सा आने लगा कि क्यूँ इतने वक़्त से उसने बिल्कुल ध्यान नहीं दिया.

आँगन में आकर उसने चंदर को आवाज़ लगाई,”चंदर……ओ चंदर.” तभी उसने देखा वो पेड़ के नीचे बैठहै और पेड़ पे बैठे कबूतर को एकटक निहार रहा है. एकदम गुम सूम…….रूपाली को गुस्सा आ गया. वो पास गयी और चिल्लाते हुए चंदर से कहने लगी कि उसकी आँखें फुट गयी हैं क्या? उसे रोज़ सफाई करते रहना चाहिए ताकि हवेली सॉफ सुथरी बनी रहे. हाथ हिला हिला कर उसने चंदर को सफाई करने के लिए कहा.

चंदर ने एक नज़र उसकी तरफ देखा और रूपाली ने देखा चंदर की आँखों में रूपाली के लिए सिर्फ़ नफ़रत थी. वो अचानक उठा और तेज़ी से भौचक्की सी रूपाली के आगे से निकल गया और दूर कहीं गुम हो गया. रूपाली के होंठो तक चंदर के लिए एक भद्दी से गाली आई, पर वो मंन मार कर रह गयी.

रूपाली ने एक नज़र आसमान की ओर देखा….कोई शाम के 6 बज रहे थे. उसके दिमाग़ में ख़याल आया, क्यूँ ना वो खेतों की तरफ जाए और अगर वहाँ कोई मज़दूर दिख जायें तो उनके साथ अगले दिन के लिए हावीली की आस पास सफाई का काम तय कर ले. उसे ये विचार अच्छा लगा.

अंदर आई और उसने जल्दी जल्दी अपने लंबे, घने बालों को संवारा, बगल में खुशबूदार फ्रांसीसी खुश्बू लगाई जो उसको कभी ससुर शौर्या सिंग ने दी थी….हल्के गुलाबी रंग का ब्लाउस पहना और गुलाबी सी साड़ी भी. शीशे में देखा, बहुत अच्छी लग रही थी रूपाली. बाहर पसीना आने का ख़तरा था, इसलिए रूपाली ने अपने गालों, गर्देन और ब्लाउस के अंदर हल्का सा पॉंड्स पाउडर लगा लिया. रूपाली ने एक बार खुद को निहारा…..और किसी 17 साल की लड़की की तरह शर्मा के रह गयी……वाकई बहुत खूबसूरत लग रही थी वो.

हवेली से चलते चलते काफ़ी दूर आ गयी थी रूपाली. इक्का दुक्का गाओं के बूढ़े उसको हुक्का पीते हुए नज़र आए और जैसे ही उन्होने ठकुराइन को देखा, अचकचा कर, “प्रणाम ठकुराइन”, कह कर उसका अभिवादन किया. रूपाली को अच्छा लगा कि आज भी हवेली का इतना रुतबा है. उन बूढ़े लोगों से काम के लिए कहना बेकार था, इसलिए वो आगे निकलती चली गयी.

सूरज ढालने लगा था और उसकी लालिमा चारों ओर फेल रही थी. रूपाली का चेहरा भी तपिश के कारण चमचमा उठा था और हल्का पसीना माथे पे मोती की तरह चमक रहा था. रूपाली को लगा अब कोई नहीं मिलेगा और उसे वापस हवेली की ओर चलना चाहिए. मुड़ने की वाली थी की उसे लगा उसे कुछ आवाज़ें सुनाई दी हों.

आवाज़ खेतों की तरफ से आई थी. रूपाली के कदम उसी तरफ बढ़ गये. अचानक उसे किसी मर्द के हँसने की आवाज़ आई और फिर से कुछ अस्पष्ट आवाज़ें. खेत गन्ने के होने की वज़ह से बहुत घना था……अचानक रूपाली को लगा उसने चूड़ियों के टूटने की आवाज़ सुनी और फिर एक लड़की की चीख आई,”ना कर सत्तू चाचा, हाथ जोड़ू तेरे…..” और एक गुर्राहट भरी मर्दानी आवाज़,”चुप्प साली…”……..और तभी रूपाली के आगे सारा नज़ारा सॉफ था…

गाओं में जात-पात थी. ऊँची जात वाले ब्राह्मण और ठाकुर, गाओं की ऊपर ओर रहते थे, और सब डोम-चमार-कहार, नाई, गाओं की निचली ओर. सारा मामला निचली जात का था. 2 काले कलूटे, 40 साल से ऊपर के चमारों ने एक 20-22 साल की मांसल से लड़की के हाथ पकड़ रखे थे और एक 50 साल से ऊपर का कलूटा उसके पैरों को खोल कर, अपना काला लंड लड़की की बुर में घुसाने की कोशिश कर रहा था. एक और 45-50 साल का अधेड़, साँवले रंग का बुज़ुर्ग ये सब ऐसे देख रहा था मानो कोई किसी गाय को चारा चरता हुआ देख रहा हो.
“ना कर सत्तू चाचा, जान दे, मैं तेरी मौधी (बेटी) जैसी हूँ रे….”…….”चुप्प कमला साली……हमरी मौधी ऐसे गांद ना फिराती फिरे गाओं भर में….अब चोद्ने दे नाहीं तो चीर देई तोहरा के….”…ये कहते हुए उसने एक असफल कोशिश और की. मगर लड़की शरीर सेमजबूत  थी और उसकी टांगे अलग होने का नाम नहीं ले रही थी. झल्लाहट में सत्तू ने एक झापड़ रसीद दिया. कमला ज़ोर से रोने लगी,”हाए दैयया रे…..कोई बचाआऊऊ……बचहाआआााऊऊ.” खेत गाओं से इतनी दूर थे कि किसी के आस पास होने का सवाल ही नहीं था. तीनो कलूटों ने उसका मुँह बंद करने तक की ज़हमत नहीं उठाई और हंसते रहे.
“क्या हो रहा है ये???…….बंद करो….सालो”, किसी बूखी शेरनी की तरह रूपाली गुर्राते हुए चीखी और एक पल के लिए मानो वक़्त थम गया था…….सब सुन्न रह गये थे. ना कमला चीखी, ना सत्तू कुछ बोला और चारों मर्द रूपाली को ऐसे देख रहे थे मानो पूछ रहे हों,”आप कौन हैं?” सांवला आदमी, जिसकी उमर 45-50 के बीच थी, धीरे से बोला,”सत्तू, कालू, मोतिया……ये हवेली की ठकुराइन हैं……परणाम ठकुराइन.”. तीनो कल्लुओं ने घबराहट में कमला को छ्चोड़ दिया जो अपने कपड़े झाड़ते हुए उठी और भाग के रूपाली के पीछे जा छुपि.

“तो यह सब हो रहा है हमारे गाओं में अब? हैं? कोई शरम लाज नहीं है आप लोगों को?”, किसी बिफरी हुई शेरनी की तरह रूपाली आग उगल रही थी. “कौन हे रे तू?” रूपाली ने कमला से पूछा तो पता चला वो झूरी मल्लाह की बेटी है और मोतिया उसे सस्ती साड़ी वाले से मिलवाने के बहाने फुसला के गाओं से कुछ दूर लाया था, जहाँ कालू और सत्तू ने उसको पकड़ लिया और तीनों उसको खेत की ओर ले आए थे. बेगानी शादी में अब्दुल्लाह दीवाना वाली हालत थी साँवले मुंगेरी की और वो ऐसे ही इन तीनो के साथ हो लिया था की कुछ देसी शराब पी लेगा और कुछ चने खा लेगा. चारों 2 बॉटल देसी शराब गटक चुके थे और उन्होने कमला को भी ज़बरदस्ती शराब पिलाने की कोशिश की थी, पर उसने सब शराब बाहर थूक दी थी. उन्होने शराब बर्बाद करने से अच्छा सोचा साली को बस कुछ देर पकड़ कर रखें और फिर नशे के सुरूर में चुदाई का प्रोग्राम चालू ही किया था की रूपाली ने आकर सब गुड-गोबर कर दिया.

रूपाली ने चिल्ला कर कहा,”चल कमला तू मेरे साथ…….और हरामजादो, कल गाओं की पंचायत लगेगी, उसमें दिखाना तुम अपने ये गंदे-काले चेहरे.” मुंगेरी,जो सिर्फ़ शराब के लालच में आया था, गिड़गिदा रहा था,”जाने दो ठकुराइन, ये बहक गये थे.”. बाकी तीनो नशे और शर्म की मिली जुली हालत में कभी आँखें झपका रहे थे, कभी खेत के ज़मीन की तरफ देख रहे थे. एक तेज़ हवा का झोंका आया और एक पल के लिए रूपाली की सारी का पल्लू सरक गया. ढलती शाम में तीनों कलूटों ने एक पल के लिए गुलाबी ब्लाउस में क्वेड दो उन्नत उरोज़ देखे और उनकी आँखें चौंधिया गयी.

सकपका कर रूपाली ने झट से आँचल ठीक किया और कदक्ते हुए बोली,”चल कमला.” मुड़कर चलने लगी, गाओं की ओर. चारों आदमी वहीं हक्के-बक्के से खड़े रह गये थे.

300 मीटर चले होंगे रूपाली और कमला कि अब सन्न होने की बारी रूपाली की थी. शायद उन कलूटों ने छ्होटा रास्ता लिया था, या तेज़ तेज़ चलते हुए बराबर के रास्ते से आए थे. जो भी था, सच्चाई यह थी कि सत्तू, मोतिया, कालू और मुंगेरी भी, उन दोनो के सामने खड़े थे. “क्या है?” रूपाली चीखी. नीच जात के मोतिया ने एक थप्पड़ रूपाली के गाल पे रसीद दिया और बोला,”हरामजादि. हमको पंचायत के हवाले करेगी? कर साली. पर उनको पूरी बात बताना. कि कैसे हम ने तेरी चुदाई की रांड़.” एक पल के लिए रूपाली को अपने कानो पे विश्वास नहीं हुआ. ये नीच जात के लोग, जो ठाकुरों की छाया पे भी पैर रखने के कारण पिट जाया करते थे, उसकी इज़्ज़त लूटने की बात कर रहे थे…….ठाकुर साहब की बहू की इज़्ज़त.
“खबरदार…”, रूपाली चिल्लाई…..मगर उसके इतना बोलते ही मोतिया ने उसे तड़ातड़ 4-5 थप्पड़ लगा दिए. पीड़ा और अपमान से रूपाली के आँसू छल-छला आए. “जाने दो…”, उसकी कराह निकली. कमला, जिसकी गदराई हुई जवानी को पाने के लिए कलूटों ने ये सब किया था बोली,”सत्तू चाचा, मोतिया भाय्या….ठकुराइन को जाने दो….आपको जो करना है, हमरे संग कर लेव भाय्या…” कालू और मोतिया वहशियो की तरह हँसने लगे. कालू ने कसकर कमला का हाथ पकड़ लिया और सत्तू और मोतिया ने रूपाली के दोनो हाथ पकड़े और वो वापस खेत के उसी हिस्से की ओर बढ़ने लगे, जहाँ उन्होने खेत के बीच कुछ जगह सॉफ की थी और कमला को चोद्ने की कोशिश ही कर रहे थे कि रूपाली आ पहुची थी……..
रूपाली और कमला की हालत ऐसी थी मानो बकरियों को कसाई घसीट रहे हों. बीच बीच में धमकाने के लिए मोतिया उसके हाथ को ज़ोर से मरोड़ देता था और हर बार उसके मुँह से आआआः, निकल जाती थी. मुंगेरी ने एक दो बार ज़रूर कहा,”अरे जानो दे रे ठकुराइन को….क्यूँ आफ़त मोले ले रहे हो….”, मगर शायद उसकी बातों की कोई अहमियत थी ही नहीं.

थोड़ी ही देर में वो सब वहीं पहुँच चुके थे जहाँ खेत के बीचों-बीच कुछ गन्ने उखाड़ कर कुच्छ सॉफ जगह बनाई गयी थी. खेत के गन्ने इतने ऊँचे थे कि अगर कोई भूले भटके आस पास आ भी जाए, उसे कुछ दिखाई देने का सवाल ही नहीं उठता था.

रूपाली और कमला को बीच में बैठा कर, उन्होने शराब की बोतलें खोल ली. सत्तू ने एक बड़ा सा घूँट लगाया और कड़वा सा मुँह बनाते हुए, बोतल रूपाली के होंठो पे लगाई और बोला,”ले, पी ले…” ये सब अचानक हुआ था, इसलिए कुछ ज़हर जैसे कड़वे घूँट रूपाली के अंदर चले ही गये. खाँसते हुए उसने थूकते हुए कहा,”देखो….कल हवेली आ जाना और हम तुम सबको 2000 रुपये देंगी. हम वादा करते हैं, बात यहीं ख़तम हो जाएगी, पंचायत नहीं होगी.”

मुंगेरी झट से बोला,”परेशान की कोई बात नहीं ठकुराइन,…….अरे सत्तू, जाने दो इन्हें.” सत्तू गुर्राया,”चुप साले. हीज़ड़ा की माफिक बात करे है हमेसा…..अब इस पार या उस पार………………….ठकुराइन, लाख टके की चूत के बदले दूई हज़ार रुपय्या? कच्ची हैं आप हिसाब की…..”

अब बहुत ही हल्की रोशनी बची थी सूरज की. रूपाली समझ चुकी थी अब कुछ नहीं हो सकता था. खुद को कोस रही थी कि क्यूँ घर से निकली. कमला, जो रूपाली के आने तक इतने हाथ पैर मार रही थी, भी अब ढीली पड़ चुकी थी. उसको लग रहा था अगर वो भाग भी जाए तो ये ग़लत होगा, क्योंकि ठकुराइन, जिन्होने अपनी ज़िंदगी उसकी खातिर दावं पे लगा दी थी, फिर भी लूट जाएँगी.

कालू और मोतिया नशे की हालत कें उन ख़ूँख़ार कुत्तों की तरह लग रहे थे जो किसी घायल चिड़िया को मारने से पहले उसको कुछ देर के लि