दामाद के द्वारा सास की चुदाई - मेरा निकला रे.. ! मैं गया....आह्ह ..

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मेरा नाम सुमन हैमेरी उम्र ४० वर्ष की हैमेरे पति का तीन साल पहले एक दुर्धटना में स्वर्गवास हो गया थामेरी बेटी स्वर्णा की शादी मैंने अभी चार महीने पहले ही सम्पन्न करा दी थी। स्वर्णा का पति शेखर कॉलेज में असिस्टेन्ट प्रोफ़ेसर था। २५ साल का खूबसूरत लड़का था। वो मेरी बेटी को ट्यूशन पढ़ाने आता था। सामने वाले गेस्ट रूम में मेरी बेटी पढ़ा करती थी। पढ़ा क्या करती थी बल्कि यह कहो कि सेक्स में लिप्त रहती थी। दरवाजे की झिरी में से मैं उन दोनों की हरकतों पर नजर रखती थी।कुछ देर पढ़ने के बाद वो दोनों एक दूसरे के गुप्त अंगो से खेलने लगते थे। कभी शेखर बिटिया के उभरती हुई छातियों को मसल देता था कभी स्कर्ट में हाथ डाल कर चूत दबा देता था। बेटी भी उसका मस्त लण्ड पकड कर मुठ मारती थी। मैंने समझदारी का सहारा लेते हुये उन दोनों की शादी करवा दी ताकि इस जवानी के खेल में कहीं कुछ गलत ना हो जाये।शादी के बाद वो अभी तक बहुत खुश नजर आ रहे थे। यूँ तो स्वर्णा के साथ अपने घर में ही रहता था, पर अधिकतर वो दोनों रात मेरे यहाँ ही गुजारते थे।रात को मैं जानकर के नौ या साढ़े नौ बजे तक सो जाती थी, ताकि उन दोनों को मस्ती का पूरा समय मिले। पर इस के पीछे मुख्य बात ये थी कि मैं उनकी चुदाई को दरवाजे की झिरी में से देखा करती थी। मेरे कमरे की बत्ती बन्द होने के कुछ ही देर बाद मेरे कानो में सिसकारियाँ सुनाई पड़ने लग जाती थी। मैं बैचेन हो उठती थी। फिर मिली जुली दोनों की आहे और पलंग की चरमराहट और चुदाई की फ़च फ़च की आवाजें और मदहोशी से भरे उनके अस्पष्ट शब्द कानों में पड़ते थे। मैं ना चाहते हुए ही बरबस ही धीरे से उठ कर दरवाजे के पास आ कर झिरी में से झांकने लगती थी।
शेखर का मोटा और लम्बा मदमस्त लण्ड मेरी आंखो में बस चुका था। शेखर का खूबसूरत चहरा, उसका बलिष्ठ शरीर मुझे बैचेन कर देता था। मेरी सांस तेज हो जाती थी। पसीना छलक उठता था। मैं बिस्तर पर बिना जल की मछली की तरह तड़पने लगती थी। चूत दबा कर बल खा जाती थी। पर यहा मेरी बैचेनी समझने वाला कौन था। धीरे धीरे समय निकलता गया....मैं अब रात को या तो अंगुली से या मोमबत्ती को अपनी चूत में घुसा कर अपनी थोड़ी बहुत छटपटाहट को कम कर लेती थी। पर चूत की प्यास तो लण्ड ही बुझा सकता है।पर हां मेरे में एक बदलाव आता जा रहा था। मैं सेक्स की मारी अब शेखर के सामने अब सिर्फ़ ब्लाऊज और पेटीकोट में भी आ जाती थी। मैं अपनी छातियो को भी नहीं ढंकती थी। लो कट ब्लाऊज में मेरे आधे स्तन बाहर छलके पड़ते थे। शेखर अब नजरें बचा कर मेरे उभारों को घूरता भी था। मैं जब झुकती थी तो वो मेरी लटकी हुई चूंचियो को देख कर आहें भी भरता था, मेरी गांड की गोलाइयों पर उसकी खास नजर रहती थी। ये सब मैं जानबूझ कर ही करती थी.... बिना ये सोचे समझे कि वो मेरा दामाद है।उसकी वासना भरी निगाहें मुझसे छिपी नहीं रहीमुझे धीरे धीरे ये सब पता चलने लगा था। इससे मेरे मन में वासना और भी भड़कने लगी थी। विधवा के मन की तड़प किसे मालूम होती है? सारी उमंगें.... सारी ख्वाहिशें.... मन में ही रह जाती हैं.... फिर चलती है आगे सिर्फ़ एक कुन्ठित और सूनी जिन्दगी....। पर एक दिन ईशवर ने मेरी सुन ली.... और मुझ पर महरबानी कर दी। और मैं शेखर से चुद गई। मेरी जिन्दगी में बहार आ गई।जब भी स्वर्णा ससुराल में होती थी तो अकेलापन मुझे काटने को दौड़ता था। मैं ब्ल्यू सीडी निकाल कर टीवी पर लगा लेती थी।
उस शाम को भी ९ बजे मैंने सारा घर बन्द किया और टीवी पर ब्ल्यू पिक्चर लगा कर बैठ गईचुदाई के सीन आने लगे .... मैंने अपनी ब्रा निकाल फ़ेंकी और सिर्फ़ एक ढीला सा ब्लाऊज डाल लिया। नीचे से भी पेन्टी उतार दी। फ़िल्म देखती जाती और अपनी चूंचियाँ दबाती जाती.... कभी चूत मसल देती.... और आहें भरने लगती.... बाहर बरसात का महौल हो रहा था। कमरे में उमस भी काफ़ी थी। पसीना छलक आया था।इतने में घर के अन्दर स्कूटर रखने की आवाज आई। मैंने टीवी बन्द किया और यूं ही दरवाजा खोला कि देखूं कौन है। सामने शेख्रर को देख कर मैं हड़बड़ा गई। अपने अस्त-व्यस्त कपड़ों का मुझे ख्याल ही नहीं रहा। शेखर मुझे देखता ही रह गया।"शेखर जी.... आओ.... आ जाओ.... इस समय.... क्या हुआ....?""जी....वो स्वर्णा के कुछ कपड़े लेने थे.... वो ऊपर सूटकेस में रखे हैं....""अच्छा लाओ मैं उतार देती हूँ।" मैंने स्टूल रखा और उस पर चढ़ गई।"शेखर ! मुझे सम्हालना....!"शेखर ने मेरी कमर थाम ली। मुझे जैसे बिजली का करण्ट दौड़ गया। उसका एक हाथ धीरे से नीचे कूल्हों पर आ गया। मुझे लगा कि काश मेरे चूतड़ दबा दे। मेरे शरीर में सिरहन सी दौड गई। मैंने सूटकेस खींचा तो मेरा संतुलन बिगड़ गया। पर शेखर के बलिष्ठ हाथों ने मुझे फूल की तरह झेल लिया।
सूटकेस नीचे गिर पड़ा। और मैं शेखर की बाहों में झूल गई। मेरा ब्लाऊज भी ऊपर उठ गया और एक चूंची बाहर छलक पड़ी।शेखर भूल गया कि मैं अभी भी उसकी बाहों में ही हूं। मैं उसकी आंखो में देखती रह गई और वो मुझे देखता रह गया।"श्....श्....शेखर्.... अब उतार दो...." मैं शरमाते हुए बोली। वो भी झेंप गया....पर शरीर की भाषा समझ गये थे...."ह.... हां हां.... सॉरी....!" उसने मेरा ब्लाऊज मेरे नंगे स्तन के ऊपर कर दिया। मैं शरमा गई।"आपकी तबियत तो ठीक है....?""नहीं.... बस.... ठीक है...." बाहर बादल गरज रहे थे। लगता था बादल बरसने को है।उसने सूटकेस खोला और कपड़े निकाल लिये। उसकी नजर मेरे ऊपर ही जमी थी। वो मेरे हुस्न का आनन्द ले रहा था। मेरे जिस्म में जैसे कांटे उग आये थे। इतने में बरसात शुरु हो गई।शेखर ने मोबाईल से स्वर्णा से बात की कि मां की तबियत कुछ ठीक नहीं है और बरसात भी शुरु हो गई है....इसलिये रात को वो यहीं रुक रहा है। सुनते ही मेरी सांस रुक गई.... हाय राम....रात को कहीं ये....? क्या चुद जाऊंगी....? पर मेरा एक मन कह रहा था कि शायद आज ऊपर वाले की जो इच्छा है....आज होने दो। मेरा मन बहुत ही चन्चल हो रहा था.... मैला भी बहुत हो रहा था.... मेरे जिस्म में एक  तड़प थी, जो शेखर बढ़ा दी थी। मैंने पलट कर शेखर को देखा.... वो मेरे चूतड़ों की गोलाईयों को देखने में मग्न था
मेरे चेहरे पर पसीने की बून्दें छलक आई।"क्या देख रहे हो....?" मैंने कांपते होठों से कहा।"जी.... आप इस उमर में भी....लड़कियों की.... सॉरी...." वो कह कर झेंप गया।"कहो.... क्या कह रहे थे.... लड़कियों की क्या....?" मेरी सां भी तेज हो उठीवो मेरे पास आकर मेरे ब्लाऊज के बटन लगाने लगा। मेरी सांसे बढ़ गई.... छातियाँ फ़ूलने पिचकने लगी। वासना ने मेरे होश खो दिये.... काश शेखर मेरी छाती दबा दे....!"सम्भालो अपने आप को मां जी...." पर मुझे कहाँ होश था। मैं धीरे से उसकी छाती से लग गई और उसका शरीर सहलाने लगी।"मां जी....ये क्या कर रही है आप....!" उसने मेरे सर पर हाथ रख दिया और सहलाने लगा।"शेखर विधवा की अगन कौन समझ समझ सकता है.... ये तन की जलन मुझे जला ना दे...." मेरा सीना फ़ूलने और पिचकने लगा था। मैंने अपनी छाती उसकी छाती से रगड़ दी।"मां.... अपने पर काबू रखो.... मन को शांत रखो.... !" शेखर ने लड़खड़ाते स्वर में कहा। वह भी बहक रहा था। उसका लण्ड खड़ा हो चुका था। उसने मेरे बाल खींच दिये और मेरा चेहरा ऊपर उठा दिया। मेरे होंठ थरथराने लगे। शेखर अपना आपा खो बैठा। मेरे से लिपट पड़ा। उसके होंठ मेरे कांपते होठो से आ लगे। आग शान्त होने की बजाए और भड़क उठी। बाहर बादल गरज के साथ बरस रहे थे।
उसके हाथ मेरे स्तनों को थाम चुके थे। ब्लाऊज आधा खुला हुआ था....मेरे बोबे बाहर छलक रहे थे। शखर के अन्दर आग सुलग उठी।"मां.... मुझसे अब नहीं रहा जा रहा है....मेरा लण्ड चोदने के लिये बैचेन हो रहा है...." मेरे सामने ही उसने निर्लज्जता से अपने सारे कपड़े उतार डाले और नंगा हो गया। उसका मोटा और तगड़ा लण्ड देख कर मेरी चूत तड़प उठी। उसने अब मेरा ब्लाऊज उतार डाला और मेरे पेटीकोट का नाड़ा खींच दिया। मेरा पेटीकोट जमीन पर आ गिरा। उसका कड़कता हुआ लण्ड सीधा खड़ा तन्ना रहा था। मैं शरम के मारे सिमटी जा रही रही थी। पसीना पानी की तरह बह निकला.... अंततः मैं बिस्तर पर बैठ गई। उसका लण्ड मेरे मुख के करीब था। उसने और पास ला कर मुँह के पास सटा दिया। मैंने ऊपर देखा.... बाहर बिजली कड़की....शायद बरसात तेज हो चुकी थी।"मां ....! ले लो लण्ड मुँह में ले लो....! चूस लो....! अपना मन भर लो.... !" उसने अपना लण्ड मेरे चेहरे पर बेशर्मी से रगड़ दिया। उसकी लण्ड की टोपी में से दो बूंद चिकनाई की छलक उठी थी।"शेखर....! मेरे लाल....! ला दे दे....! " मैं बैचेन हो उठी।
मैंने उसके लण्ड की चमड़ी उपर की और लाल सुपाड़ा बाहर निकाल लिया। और अपने मुँह में रख लिया। मैं लण्ड चूसने में अभ्यस्त थी....उसका सुपाड़ा को मैंने प्यार स्र घुमा घुमा कर चूसा। मन की भड़ास निकालने लगी। इतना जवान लण्ड.... कड़क....बेहद तन्नाया हुआ.... शेखर सिसकारियाँ भरने लगा।"हाय मां.... ! क्या मेरा निकाल दोगी पूरा....! " मैंने थोड़ा और चूस कर कर छोड़ दिया फिर शेखर को अपनी नीची निगाहों से इशारा किया। शेखर मुझसे लिपट गया। मेरा नंगा जिस्म उसकी बाहों में झूल गया। मेरा जिस्म अब आग में जल रहा रहा था। मैं बेशर्मी