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मेरा नाम ममता है और अभी पिछले साल गर्मियों में ही मेरी शादी हुयी है। मेरा पति फौज में नौकर है और तीन बहनों में अकेला भाई है। मेरी दो ननदों की शादी हो चुकी है और तीसरी की तैयारी है।
शादी के समय मेरा पति से थोड़ा मनमुटाव सा हो गया। सुहागरात को ही वे भड़क गए कि तुम कुआँरी नहीं हो। जाने किस-किस से चुदा कर आई हो। उनकी बातें मुझे बहुत बुरी तो नहीं लगीं; पर मैं उनसे ऐसे बरताव की आशंका नहीं कर रही थी।
कुवाँरी तो मैं सचमुच ही नहीं हूँ, लेकिन मुझे छिनाल भी नहीं कह सकते। मेरा कौमार्य मेरे सौतेले बाप ने नष्ट कर दिया था और उसमें मेरी सहमति भी थी। कोई दो साल तक मेरा सौतेला बाप, जिसे अब आगे से मैं बापू ही कहूँगी, मेरे साथ खूब 'सोता' रहा है।
मेरी माँ 36 साल की उम्र में ही विधवा हो गयी थी और मेरे नाना जी की इतनी गुंजाइश नहीं थी कि वे हमारा गुजारा चला सकें। तब मैं 13 साल की थी और मेरा भाई 15 का।
हमें हमारे दादा-दादी के वहां से सिवाय दुत्कार के कुछ नहीं मिला। हमारे पिता के गुजरते ही उन लोगों का हमारे प्रति व्यवहार एकदम से बदल गया और हमारे दादा जी ने सारी सम्पदा हमारे ताऊ को सौंप दी। सच्चाई तो भगवान ही जाने, लेकिन लोग कहते हैं कि हमारी ताई के दादा जी से 'नाजायज' शारीरिक ताल्लुकात थे और उन्होंने चूत लुटाने के दम पर सारी सम्पत्ति हड़प कर ली। हमारी दादी अक्सर बीमार रहती और मेरी इसका लाभ उठाते हुए मेरे कामुक दादा जी को पूरी तरह से वश में कर लिया। हमारे ताऊ सब कुछ जानते हुए भी मतलब निकलने के लिए चुप बने रहे।
मैं ज्यादा तो नहीं पर इतनी समझ रखने लगी थी कि क्या हो रहा है। एक चूत में कितना दम है यह बात तो मैंने बचपन में ही देख और सीख लिया था
मेरी माँ ने हमारे गुजर बसर के लिए एक प्राइवेट स्कूल में  पढ़ाने का काम शुरू कर दिया। वह रोजाना सवेरे ही निकल जाती और कई बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने के बाद देर शाम तक आती। समय के साथ उनका आकर्षण स्कूल के विधुर संचालक के प्रति बढ़ गया और उन्होंने नाना जी की सहमति से उनसे 'विवाह' कर लिया।
पहली ही नजर में मैंने देख लिया कि लड़कियों के प्रति हमारे नए 'बापू' की नजर अच्छी नहीं है। उनके कई महिला 'टीचर्स' के साथ सेक्स के संबंध हैं। वे संबंध मम्मी के आने के बाद भी बने रहे।
संचालक को स्कूल में सभी बापू कहते थे। वही सम्बोधन हमने भी अपना लिया। हम चाह कर भी उन्हें 'पापा' नहीं कह  रहे थे। हमारे पापा में सज्जनता और कुलीन संस्कारों की जो बातें थी वे इस बापू में दूर-दूर तक नजर नहीं आनेवाले थे। लेकिन मजबूरी में हमें उसके साथ ही समय बिताना था।

बापू ने हमें अपने स्कूल में ही एडमिट कर लिया था। मैंने गौर किया कि जब भी मैं बापू के सामने होती उसकी नजर घूम-फिर के मेरी छाती पर ही टिकती थी। मेरे स्तनों की गोलाइयाँ मेरी अवस्था के हिसाब से अधिक तेजी से बढ़ रही थी। बापू अक्सर ही लाड के बहाने मुझे खुद से चिपटा लेते थे। कुछ इस तरह कि मेरे स्तनों का स्पर्श-सुख उन्हें मिले और उनके मचलते लंड का स्पर्श-सुख मुझे मिले।
मेरे गालों को तो वे दिन में कम से कम दो बार चूमते ही थे। एक बार तो अकेले में पाकर मुझे जोर से होठों पर चूम लिया। मुझे बड़ा अच्छा लगा तो मैंने भी मौका देखना शुरू कर दिया कि वे कब मुझे अकेले में मिलें। मुझे अपनी मम्मी की तरह मजबूरी में दूसरे के आसरे जिंदगी नहीं गुजारनी थी। मुझे पता था बापू हाथ आ जाये तो मेरी, भाई और मम्मी की भी जिंदगियां ही संवर जायेंगी।
भाई और मम्मी दोनों हम पर नजर रखते थे। जब भाई सीनियर में आया तो बापू ने उसे बोर्डिंग स्कूल में भेज दिया। यानी अपने खुल कर खेलना शुरू करने की गुंजाईश बढ़ा ली।
इस बीच मम्मी की व्यस्तता बढ़ने लगी और मेरी जवानी परवान चढ़ने लगी।
एक बार फिर जब उन्होंने मुझे अकेले में किस किया तो मैंने भी गर्मजोशी से उनसे चिपट कर उनको जोर से होठों पर चूम लिया। फिर तो खेल शुरू हो ही गया। मुझे होश था कि आज नहीं तो कल मुझे ससुराल जाना ही पड़ेगा और तब मेरी माँ फिर इस खिलंदड़ बापू की मुहताज दासी बनी रहेगी। इसलिए समय रहते मुझे अपना खेल बना लेना है। मुझे अपने ताई की याद आई तो मैंने मन-ही-मन कहा; धन्यवाद ताई, तुमने मुझे चूत की ताकत के बारे में जल्दी ही जगा दिया है!

बापू को तो बस सिगनल मिलना चाहिए था। वे तुरंत ही मेरे बूब्स मसलने लगे। मेरी पोषाक  भीतर हथेली  जाकर निपल्स को छेड़ने लगे। एक बार से मेरे होठों को जोर से चूसा और बोले- स्कूल के केबिन में आ जाना आज चार बजे! मैं कुछ कहे बिना मुस्कराती हुयी चली गयी, लेकिन केबिन में नहीं पहुंची।
उस दिन वे बड़े खुश बने रहे। सारे दिन मटकते से रहे। उस रात मम्मी को मेरे कमरे में भी नही आने दिया। अपने पास ही सुलाये रखा। उसके कमरे से सेक्स में लगे जोड़ों की सी आहटें आती रह। मम्मी बापू के खिलंदड़ी स्वभाव के कारण उनसे बहुत ज्यादा राजी नहीं थी। इसी कारण वे बापू के बजाय मेरे पास ही सोती थी। जब बापू का, या हो सकता है कि मम्मी का भी, 'मन' होता तो बापू के कमरे में चलीं जाती- लेकिन वापस आकर मेरे ही साथ सोती।
उन्होंने पति से नहीं बल्कि 'रोटी-पानी' और हमारे भविष्य की सुरक्षा से समझौता किया था। मुझे यह बात खूब समझ आ रही थी और हमेशा कचोटती रहती थी।
एक दिन बापू मेरे बूब्स को मसलते हुए इनकी गोलाइयों की तारीफ कर रहे थे तो मैंने हँसते हुए कहा- बापू ये जल्दी ही लटक जानेवाले हैं।
बापू ने चौंक कर पूछा- क्यों?
मैंने जबाब दिया- देखते नही कि मेरे मम्मे इतने बड़े हो गए और मेरे पास एक भी ब्रा नहीं है। मम्मी वाले पहनूं क्या?
उसी शाम बापू ने मम्मी को खुली छूट देकर बाजार भेजा और तबसे हमें बेहतरीन पोशाकें पहनने की एक नयी दुनिया ही मिल गयी। बापू के पास पैसा तो बहुत था, लेकिन मम्मी के प्रति मन नहीं था। मम्मी भी शरीर से तो नहीं लेकिन मन से जरूर बूढी हो गयीं थी।

बापू का मुझे केबिन में बुलाने का, या सीधे कहें तो चोदने का, दबाव बढ़ता ही जा रहा था। एक दिन जब माँ को शहर में ही एक रिश्तेदार के वहां जाना था तो मैंने भी हाँ कर दी। बापू ने चार बजते-बजते स्टाफ सहित सबको किसी-न-किसी बहाने टरका दिया। जब मैं केबिन में पहुंची तो स्कूल के में गेट पर ताला लगा हुआ था और बापू पैंट का जिप खोल कर लंड को सहला रहे थे।
मुझे देखते ही मुस्कराये और कहा- आओ मेरी जान, बड़ी देर से तुम्हारी राह देख रहा हूँ।
मैंने भी सोचा कि अब समय खराब करके कोई फायदा नही। मैं उनके खुले और खड़े लंड की परवाह नहीं करते हुए आगे बढ़ी और उनकी गोद में बैठ कर उनके होठों को चूसने लगी। बापू ने तुरंत ही मेरे बूब्स पकड़ के मसलना शुरू कर दिया। मैंने कहा कि मेरी ड्रेस पर सलवट पड़ जाएगी तो बुरा लगेगा। उन्होंने तुरंत ही मेरी टॉप उतारने में मेरी मदद की और फिर मेरे स्कर्ट के जिप टटोलने लगे। मैंने स्कर्ट भी उतर दिया। फिर अड़ गयी। मैंने कहा- बापू तुम मेरी कुंवारी चूत चोदने जा रहे हो। निछावरि क्या दोगे? तुम जब तक चाहो मैं तुम्हारी रखैल बन के रहने को तैयार हूँ!