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कहानी का पहला भाग: गर्लफ्रेंड के साथ मेरा पहला सेक्स-1

मैंने अपना हाथ उसकी जींस के अंदर कर दिया और उसकी पैंटी के ऊपर से ही उसकी चूत पर फिराने लगा। वह बुरी तरह सिसकारियां भर रही थी। उसकी पैंटी पर गीलापन मेरे हाथ को साफ महसूस हो रहा था।

धीरे-धीरे बढ़ते-बढ़ते मेरे होंठ उसकी पैंटी पर आ गये और पैंटी के ऊपर से ही उसकी चूत की गर्माहट महसूस करने लगे। उसके पानी की सुगंध मुझे और मदहोश किये दे रही थी।


वह अब भी अपनी हथेलियों से अपनी आंखें ढके लेटी हुयी थी। अपने बदन की थरथराहट पर उसका काबू नहीं था।

फिर मैं बेड से नीचे उतर आया और पांयचों से पकड़ कर उसकी जींस खींचने लगा। पर जींस उसकी एड़ी पर चढ़ने में दिक्कत दे रही मैं परेशान था। मेरा अकड़ा हुआ लंड बार बार फनफना रहा था।


“बुद्धू!” अचानक मुझे उसकी फुसफुसाहट सुनाई दी।


यह एक प्रकार से मेरे लिये चैलेंज था। खैर मैं उसकी जींस के पांयचे उसके पैरों से बाहर तक लाने में सफल हो ही गया। उसके बाद तो आसान था। मैं सोच रहा था कि अगर जींस स्टेचेबेल न होती तो वह इसे कैसे पहन पाती ? पर यह सोच अधिक देर तक मुझे परेशान नहीं कर पाई।

मैंने उसके दोनों पैर फैलाये और उनके बीच में आ गया। मेरे बीच में आते ही उसने अपनी जांघें भींच कर मुझे दबा लिया। उसकी गुदाज संगमरमरी जांघों का मादक स्पर्श मेरे बदन को भी मदमस्त कर रहा था। मेरे भी सारे शरीर में करंट सा बहने लगा था।


मुझे अचानक लगा कि मेरी टी-शर्ट बीच में बाधा बन रही है। इस समय कोई भी बाधा मुझे सहन नहीं थी। मैंने टीशर्ट खींच कर निकाल दी। अब उसकी मस्त जांघों और मेरे कमर के ऊपर के शरीर के बीच कोई दीवार नहीं थी।

मेरी शर्ट हटने का उसे भी अहसास हो गया। मैंने देखा कि वह अपनी उंगलियों की दराजों से झांक कर मेरे बदन को निहार रही है। यह अहसास आते ही मैंने हाथ बढ़ा कर उसकी दोनों हथेलियां काबू में कीं और उसे भी खींच कर बिठा लिया।


वह एक शर्मीली मुस्कुराहट लिए खिंची चली आई। वह भी अब सारी सीमायें तोड़ डालने के लिये उतनी ही उतावली थी जितना कि मैं। उठते ही उसने अपनी बाहें मेरे गले में पिरो दीं और अपने होंठ मेरे होंठों पर रख दिये।

अब मुझे उसका टॉप अखर रहा था। मैंने टॉप का सिरा पकड़ा और ऊपर खींचने लगा। मेरी हरकत देख कर उसने एक बार अपनी बाहें खींच कर अपने सीने पर क्रॉस की तरह से बांध लीं पर अगले ही क्षण मेरी आंखों झांकते हुए मुस्कुराई और बाहें ऊपर उठा दीं।


मैंने उसका टॉप उसके शरीर से अलग कर दिया। अब वह मेरे सामने सिर्फ ब्रा और पैंटी में बैठी हुयी थी।


उसका मरमरी बदन मेरी सहनशक्ति की परीक्षा ले रहा था। मैं अब पूरी तरह उसके भीतर समा जाना चाहता था। मैं अब उसके मादक यौवन में खो जाना चाहता था। उसके मस्त उरोज मेरी उम्मीद से भी कहीं अधिक भरे-हुये और सुडौल थे। मेरी निगाहें उनसे हटने का नाम ही नहीं ले रही थीं।

अचानक उसने अपनी हथेलियां मेरे सिर के पीछे टिकाईं और मेरा सिर खींचकर अपनी गुदगुदी छाती में भींच लिया।


मैंने भी अपना सिर उसके सीने में धंसा दिया और उसकी गोलाइयों के एक-एक इंच पर अपने होंठों के स्पर्श के सुबूत छोड़ने लगा। मेरी नाक उसके शरीर की मस्त गंध अपने भीतर समेट रही थी। मेरे सारे रोंये खड़े हो गये थे।

मैंने अपना चेहरा उसके बूब्स में धंसाये-धंसाये ही अपने हाथ उसकी पीठ पर फिराना शुरू कर दिया। जाहिर है, मेरी उंगलियों की करामात का अगला स्टेप उसकी ब्रा का हुक ही था। मैंने अपने दोनों हाथ उसकी पीठ पर फिराते-फिराते अंततः उसकी ब्रा की हुक पर अपनी उंगलियां टिका दीं और उससे खेलने लगा। वह चिहुंक उठी, उसके बदन की थरथराहट और बढ़ गयी … और अगले ही पल मेरी उंगलियों ने उसकी ब्रा का हुक खोल दिया और ब्रा के स्ट्रेप उसके कंधे से खींच दिये। अब ब्रा सिर्फ मेरे चेहरे से दबी हुई उसकी छाती से चिपकी हुई थी।

मैंने अपना चेहरा पीछे खींचना चाहा पर उसने उसे और कस कर भींच लिया।


“अरे छोड़ो तो!” मैंने कांपती हुई आवाज में कहा।


“नहीं!” उसकी आवाज मुझसे भी ज्यादा कांप रही थी।


“छोड़ना तो पड़ेगा।”


“नहीं, मुझे शर्म लग रही है।”


“पर इस शर्म में मजा भी तो आ रहा होगा?”


“हां, सो तो है।” कहते हुए उसने अपनी ठुड्डी मेरे सिर पर टिका दी।


“तो छोड़ो, यह आवरण हटते ही शर्म और बढ़ जायेगी।”


“शर्म बढ़ेगी तो आनंद भी चौगुना हो जायेगा।”


“ऐसा?” उसने थरथराती हुयी मदहोश सी आवाज में कहा।


“हां, ऐसा!”


“तो लो !!!” उसने झटके के साथ मेरा सिर पीछे खींच दिया।

जन्नत का नजारा मेरे सामने था। मैंने बिना जरा सी भी देर किये उसकी ब्रा से उसके खरबूजों जैसे उरोजों की इच्छा पूरी कर दी। पिंजरे में फड़फड़ाते उन कपोतों को आजाद कर दिया।


ब्रा को हाथों से निकल जाने देने भर के लिये उसने अपनी हथेलियां मेरे बालों से अलग कीं। मैंने ब्रा बेड पर एक तरफ फेंक दी और उतनी देर में ही उसने मेरा सिर फिर से अपनी छाती में भींच लिया। अब मेरे होंठों और उसके निप्पल्स के बीच कोई दीवार नहीं थी। मैंने बेधड़क एक निप्पल को अपने होंठों से दबा लिया। उसे अपने दांतों से चुभलाने लगा … और फिर उसे बिल्कुल किसी बच्चे की तरह चूसने लगा।

मेरे होंठों की हरकत ने उसकी तड़प की आग में घी डाल दिया। उसकी सिसकारियां और तेज हो गयीं। सिसकारियों के साथ ही अब उसके मुंह से आह!! … ऊह!! … ओह!!! की आवाजें भी निकलने लगीं। उसका बदन और जोर से कांपने लगा। मेरे बदन के गिर्द उसकी जांघों का कसाव और बढ़ गया था। वह बार-बार अपनी जांघों को भींच रही थी। अचानक उसका बदन ऐंठने लगा। उसके साथ ही मेरी छाती से लगी उसकी पैंटी का गीलापन मुझे साफ महसूस होने लगा।


उसका बदन कई बार कांपा और फिर उसका कसाव ढीला पड़ गया। उसके चेहरे पर एक संतुष्ट मुस्कुराहट फैल गयी।

“यू नॉटी!!!!” बरबस ही उसके मुंह से कराहटों के स्थान पर ये अलग ही शब्द फूट पड़े। साथ ही उसने अपनी हथेली मेरे ठुड्डी के नीचे लगा कर मेरा चेहरा उठा लिया। जैसे ही मेरी नजर उसकी नजर से मिली, उसकी पूर्ण संतुष्ट मुस्कुराहट शरमा उठी पर उसने अपनी पलकें नहीं गिरायीं। उसकी पलकें, उसकी आंखें, उसके होंठ … उसका पूरा अस्तित्व मुस्कुरा उठा था। वह झुकी और अपने होंठ मेरे होंठों पर रख दिये।


“थैंक्यू!” वह फुसफुसायी।


“अभी से … अभी तो बहुत मजा लेना है।” मैं भी फुसफुसाया।


“तो लो ना! रोका किसने है।” वह आनंद से फुसफुसायी।

लाइन क्लियर थी। मैंने हपने हाथ उसकी पैंटी की इलास्टि पर टिका दिये और अपने अंगूठे पैंटी के अंदर सरक जाने दिये।


जैसे ही मैंने पैंटी की इलास्टिक खींची, उसने मुस्कुराते हुए अपने पैरों के पंजे मेरी जांघों पर टिकाते हुए अपने नितंब को इतना उचका दिया कि मैं आसानी से उसकी पैंटी खींच सकूं। अगले ही पल उसकी पैंटी भी उसके शरीर से दूर पड़ी थी। अब वह मेरी आंखों के सामने पूरी तरह से निर्वस्त्र थी। कपड़ों के नाम पर एक धागा भी उसके शरीर पर नहीं था। पर इस प्रक्रिया में मुझे उसकी जांघों के बीच से हटना पड़ा था। मेरे हटते ही उसने झट अपनी जांघें सिकोड़ दीं। स्वर्