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शादी की रात चाची का बलात्कार - चाची की चुदाई की कहाँनी हिन्दी में

शादी की रात चाची का बलात्कार - चाची की चुदाई की कहाँनी हिन्दी में

शादी की रात चाची का बलात्कार - चाची की चुदाई की कहाँनी हिन्दी में : मेरा नाम गिरीश जाट है, मैं जयपुर में रहता हूँ, मेरी हाइट पाँच फुट ग्यारह इंच है। बात तब की है जब मेरे भाई की शादी थी। शादी हमारे गाँव में थी। शादी के सभी इंतज़ाम हमारे बड़े वाले घर में जहाँ दादाजी रहते थे किया गया था। जाहिर है कि शादी जैसा मौका था तो पूरा परिवार आया हुआ था। हमारे दो मकान कुछ दूरी पर थे जहाँ हम कम ही रहते थे। शादी से 3 दिन पहले की बात है, मेरी चाची छोटे वाले घर में ही सोने वाली थी। मैं अपने पुराने दोस्त के घर से वापस लौट रहा था कि मैंने चाची के घर की लाइट्स जलती हुई देखी तो मैं वहाँ गया।

पता चला कि आज चाची अकेली वहीं सोने वाली है। बस फिर क्या था, मेरे खुराफाती दिमाग़ में एक तरकीब आई और मैंने चाची से कहा- मैं घर जा रहा था पर अब रात हो गई तो अंधेरा बहुत है। तो क्या मैं यहीं पर सो सकता हूँ। चाची ने मेरी उम्मीद के अनुसार ही हाँ कर दी। बिस्तर लगे, चाची ने मेरे लिए एक अलग खाट लगाई और खुद अपनी खाट पर सो गई।

रात के करीब 1:30 बजे मैं उठा और स्थिति का जायजा लिया। चाची गहरी नींद में सो रही थी। चाची बाँयी ओर करवट ले कर सोई थी और एक टाँग को घुटने से मोड़ रखा था।
मैं चाची के पास गया और चाची का लहंगा खिसका कर जाँघों तक कर दिया और दो मिनट रुका, फिर मैंने लहँगे को पीछे से ऊपर किया तो चाची के मोटे चूतड़ नज़र आई और साथ ही उनकी टाँग के मुड़े होने से चूत की दरार भी दिखने लगी।

मैंने हिम्मत जुटा कर चाची के कूल्हे पर हाथ फेरा।
फिर मैंने सोचा कि कहीं जाग गई तो प्लान फ़ेल हो जाएगा तो मैं चाची की बगल में लेट गया। मैंने अपना पायज़ामा नीचे सरकाया और लंड बाहर निकाला जो उत्तेजना में फटने पर आया था।
इस तरह मुझे परेशानी हो रही थी तो मैंने उठ कर पायज़ामा उतार कर मेरी खाट पर पटक दिया। अब मैंने अंडरवीयर के होल से लंड बाहर निकाला और फिर से चाची की बगल में लेट गया और लंड को चाची की चूत की दरार से छूआने लगा।

फिर मैंने अपनी कमर को उठाया, चाची की चूत को फैला कर अपने लंड का सुपारा उसमें फंसाया ही था कि चाची की नींद टूट गई और वो हल्की सी कसमसाई।
मैंने फुरती से अपनी एक टाँग को चाची की टाँग पर रखा, हाथ को चाची के बोबे पर ले जा कर कमर को झटका मार दिया, मेरा लंड इस हल्के से झटके से आधा अंदर घुस गया।

चाची हड़बड़ाती हुई बोली- गिरीश क्या कर रहा है?
मैंने बिना कुछ बोले एक और झटका दिया और पूरा लंड चाची की चूत में उतार दिया।
चाची उठने को हुई तो मैंने उन्हें कस कर पकड़ लिया।

चाची बोली- गिरीश, यह क्या कर रहा है, छोड़ मुझे, वरना तेरी मम्मी को बता दूँगी ये सब।
मैंने कहा- चाची, प्लीज़ एक बार आप की चुदाई कर लेने दो प्लीज़! और फिर आपको भी तो नया लंड लेने की चाहत होगी ना?
चाची चिल्लाई- नहीं होती मुझे कोई चाहत… अब तू छोड़ मुझे और अपनी खाट पर जा। सुबह देख, मैं तेरी लंका लगाती हूँ।
मैंने कहा- जब सज़ा लेनी ही है तो जुर्म किए बिना क्यूँ?
और मैंने झटके मारने चालू किए।
धीरे धीरे लंड की गरमी से चाची गरम होने लगी तो मैं मौका ताड़ कर चाची के बोबे दबाने लगा और उनकी गर्दन पर चुम्बन करने लगा।
मेरे इस वार के आगे चाची टिक नहीं पाई और पानी छोड़ दिया जो मैं अपने लंड पर महसूस कर सकता था।
चाची के सब्र का बाँध टूटा और उनके मुख से निकला ‘आहह उम्म्म ममम… गिरीश चोदो इसस्सस्स…’

मैंने झटके लगाने शुरू किए तो लगातार 10 मिनट तक चोदता रहा और चाची की चूत को अपने रस से सराबोर कर दिया।
मैं यू ही चाची की चूत में लंड डाले लेता रहा, चाची भी चुपचाप लेटी रही।

करीब 15 मिनट के बाद मैं उठकर बैठ गया और चाची को सीधा किया, फिर मैं चाची के बोबे दबाने लगा।
कुछ देर बाद मैंने उनकी चूत को उनके लहँगे साफ किया और अपना मुँह उस पर टिका दिया और चाटने, चूसने लगा।

चाची गर्म होने लगी और मेरा लंड भी फिर से तैयार था।
मैंने चाची का हाथ पकड़ कर लंड पर रख दिया तो वो उसे आगे पीछे करने लगी।
फिर मैंने चाची के सारे कपड़े उतारे और खुद भी नंगा होकर चाची के ऊपर लेट गया।
अब मैंने चाची को कहा कि वो लंड को सेट करें!

तो उन्होंने अपने हाथ से मेरे लंड को पकड़ कर छूट के द्वार पर रख दिया।
मैंने ज़ोर लगाया तो पूरा लंड सरसराता हुआ अंदर चला गया, चाची के मुख से आहह फ़ूट पड़ी।

अब मैं चाची को चोदे जा रहा था और वो भी अपने मुख से सिसकारी मार कर और आहें भरकर माहौल को और रंगीन बना रही थी- आहहहह उम्म्म मम सस्स्स सस्स राआआअहहुउल उम्म्महह चोदो ज्ज्जोर से आअहह।

ये सब सुनकर मैं भी शताब्दी एक्सप्रेस की तरह नोन स्टॉप धक्के मार रहा था।
कुछ देर के बाद मैंने उन्हें घोड़ी बनाया और फिर पेल पेली चालू।
करीब 15 मिनट की हॉट राइड के बाद मैं और चाची एक साथ झड़ गये, उनके चेहरे पर संतोष झलक रहा था।
फिर हम यूँ ही सो गये।

 

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